Trump की चेतावनी से बढ़ा वैश्विक तनाव, NATO और होर्मुज स्ट्रेट पर नई सियासी खींचतान
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने NATO को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर सहयोगी देश होर्मुज स्ट्रेट को खोलने में अमेरिका की मदद नहीं करते, तो NATO का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और यूरोप समेत कई देशों में चिंता बढ़ा दी है।
NATO को लेकर Trump की सख्त चेतावनी
North Atlantic Treaty Organization (NATO) के बारे में ट्रंप लंबे समय से आलोचनात्मक रुख रखते रहे हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका ने रूस के खिलाफ युद्ध में Ukraine की मदद की है, इसलिए अब यूरोपीय देशों की जिम्मेदारी है कि वे होर्मुज स्ट्रेट के मुद्दे पर अमेरिका का साथ दें।

ट्रंप ने साफ कहा कि अगर यूरोप से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो ये NATO के भविष्य के लिए “बहुत बुरा” साबित हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि ये बयान सहयोगी देशों पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है।
NATO से क्यों नाराज रहते हैं Trump ?
NATO की स्थापना 1949 में सोवियत संघ के खतरे के खिलाफ यूरोप और उत्तरी अमेरिका की सामूहिक सुरक्षा के लिए हुई थी। इसके अनुच्छेद-5 के अनुसार किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है।
लेकिन ट्रंप का आरोप रहा है कि कई यूरोपीय देश अमेरिका की सुरक्षा छत्रछाया में रहते हुए अपने रक्षा बजट में पर्याप्त योगदान नहीं देते। इसी वजह से वे बार-बार NATO की भूमिका और संरचना पर सवाल उठाते रहे हैं।
Trump की मांग, यूरोप की दुविधा
ट्रंप की मांग ये है कि यूरोपीय देश होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रखने के लिए सैन्य कार्रवाई में सहयोग करें। हालांकि यूरोप के कई देशों ने इस पर अलग-अलग राय जताई है।
फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron पहले ही कह चुके हैं कि यूरोप को रणनीतिक रूप से अधिक स्वतंत्र बनने की जरूरत है। वहीं जर्मनी, इटली और स्पेन ने संयुक्त बयान जारी कर ईरान पर हमलों की आलोचना की है और अमेरिका-ईरान वार्ता बहाल करने की मांग की है।

दूसरी ओर ब्रिटेन ने सीमित स्तर पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति दी है।
होर्मुज स्ट्रेट का रणनीतिक महत्व
Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% इसी रास्ते से गुजरता है।
अगर ये मार्ग बंद होता है तो सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों—जैसे China, India, Japan और South Korea—पर पड़ सकता है, क्योंकि ये देश खाड़ी देशों से बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं।
ईरान का सख्त रुख
इस बीच Iran के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने साफ कहा है कि तेहरान ने न तो सीजफायर की मांग की है और न ही अमेरिका से किसी तरह की बातचीत की है।

उन्होंने कहा कि ईरान अपनी रक्षा के लिए लंबे समय तक संघर्ष करने को तैयार है। साथ ही ये भी बताया कि हमलों के बाद ईरान का संवर्धित यूरेनियम भंडार मलबे के नीचे दब गया है और फिलहाल उसे निकालने की कोई योजना नहीं है।
इजरायल की तेज कार्रवाई
इधर Israel ने भी ईरान के अंदर सैन्य हमले तेज कर दिए हैं। इजरायली रक्षा बलों ने दावा किया है कि पिछले 24 घंटों में पश्चिमी और मध्य ईरान में 200 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया गया है, जिनमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के ठिकाने भी शामिल हैं।

इन हमलों का उद्देश्य ईरान की सैन्य कमान और हथियार उत्पादन क्षमता को कमजोर करना बताया जा रहा है।
वैश्विक राजनीति में बढ़ती अनिश्चितता
ट्रंप के बयान ने NATO के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है। अगर यूरोपीय देश अमेरिका का साथ देते हैं तो वे एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में उलझ सकते हैं। वहीं अगर वे इससे दूर रहते हैं तो NATO की एकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
मौजूदा हालात में मिडिल ईस्ट का संकट केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक संतुलन को प्रभावित करने वाला मुद्दा बन चुका है।
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