PM Series Rajiv Gandhi. एक तरफ मां का शव, दूसरी तरफ PM बनने का दबाव. छठे प्रधानमंत्री राजीव की PM बनने की दर्दभरी दास्तां||
New Delhi – Prime Minister Series के पिछले एपिसोड में हमने आपको बताया कि कैसे Indira Gandhi ने देश के पांचवे प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को सबक सिखाने के लिए उनकी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिरा दी. इस तरह चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक कुल साढ़े पांच महीने तक ही पीएम पद संभाल सके थे. आज बात देश के छठे प्रधानमंत्री राजीव गांधी की. चौधरी चरण सिंह की सरकार गिरने के बाद इंदिरा गांधी को तीसरी बार देश की सत्ता संभालने का मौका मिला था. उनके तीसरे कार्यकाल में दो बड़े घटनाक्रम हुए जिसने गांधी परिवार को सबसे बड़ी क्षति पहुंचाई.
पहला – 23 जून 1980 को उनके छोटे बेटे संजय गांधी कि विमान दुर्घटना में मौत.
दूसरा – 1 जून 1984 को पंजाब के अमृतसर में हुआ Operation Blue Star.
जब राजीव को मिली ‘मां’ पर हमले की खबर

पंजाब में उठी खालिस्तान की मांग को कुचलने के लिए इंदिरा गांधी को Operation Blue Star करना पड़ा और वही आगे चलकर उनकी मौत की सबसे बड़ी वजह बना. 31 अक्टूबर की सुबह राजधानी दिल्ली में उनके अपने सुरक्षा गार्ड्स ने उनकी हत्या कर दी. उस समय देश के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ओमान यात्रा पर थे और इंदिरा के बड़े बेटे राजीव पश्चिम बंगाल दौरे पर थे. उस वक्त राजीव गांधी पश्चिम बंगाल के कोंटाई में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे. उन्हे पर्ची पर लिख कर बताया गया कि भाषण जल्द खत्म करिए, हमें तुरंत दिल्ली निकलना है. राजीव अपना भाषण खत्म करके पूछा कि क्या हुआ. तब उन्हे कांग्रेस परिवार के सबसे करीबियों में से एक प्रणब मुखर्जी ने बताया कि इंदिरा जी पर हमला हुआ है. ये सुन कर राजीव को बड़ा झटका लगता है. लेकिन जैसे तैसे वो खुद को संभाल कर दिल्ली के लिए रवाना होते हैं. राष्ट्रपति को भी ओमान से वापसी का बुलावा भेजा जाता है.
प्लेन में राजीव को PM बनाना तय हुआ
उधर कलकत्ता में करीब एक बजे Rajiv Gandhi Indian Airlines के विशेष विमान ने उड़ान भरते हैं… इस विमान में राजीव के साथ कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी थे. उड़ान भरने के तुरंत बाद राजीव को पता चलता है कि उनकी मां Indira Gandhi अब नहीं रहीं. प्रणब दा भी बुरी तरह रोने लगते हैं. राजीव पहले खुद को संभालते हैं और फिर प्रणब दा को. इंदिरा की अचानक मौत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने फिर वही सवाल खड़ा था, कि अब कौन बनेगा प्रधानमंत्री.? इंदिरा की मौत के विलाप के बाद अब प्लेन के अंदर की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी कि अब आगे की रणनीति क्या होगी. प्रणब दा के सामने जब ये चर्चा हुई तो सबने मिलकर ये तय किया कि राजीव को प्रधानमंत्री बनना चाहिए. इस महामंथन के बाद प्रणब दा राजीव को विमान के पिछले हिस्से में ले गए और कहा – अब आपको ही PM बनना होगा. दादा की बात सुन कर Rajiv Gandhi उनसे पूछते हैं कि क्या आपको लगता है मैं ये सब संभाल पाउंगा? तब दादा उन्हे समझाते हुए कहते हैं– हां बिलकुल… हम सब आपकी मदद के लिए हमेशा साथ हैं. आपको फुल सपोर्ट मिलेगा.
इंदिरा की हत्या से घबराईं सोनिया... कहा तुम नहीं बनोगे PM

इसी माथापच्ची में दोपहर के करीब 3 बजे विमान दिल्ली में उतरता है… कैबिनेट सचिव कृष्णास्वामी राव, गृह सचिव, राजीव के चचेरे भाई अरुण नेहरू और कुछ अधिकारी उन्हे रिसीव करने पहुंचते हैं और वहां से सीधे एम्स अस्पताल के लिए रवाना हो जाते हैं. क्योंकि हमले के बाद इंदिरा गांधी को वहीं ले जाया गया था. करीब 25 मिनट बाद राजीव एम्स अस्पताल पहुंचते हैं तो आंसुओं का सैलाब अपनी आखों में लिए Sonia Gandhi अपने पति के गले लग कर रोने लगती हैं… वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई अपनी किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री’ में लिखते हैं कि सोनिया अपनी सास की हत्या से बहुत घबरा गई थीं. वो बार-बार राजीव से एक ही बात कह रही थीं कि वो पीएम नहीं बनेंगे. पहले वो लगातार राजीव से रिक्वेस्ट करती रहीं… इसके बाद झगड़ने लगीं और एक ही बात बोलती रहीं कि तुम PM नहीं बनोगे. अगर तुम PM बने तो वो तुम्हें भी मार डालेंगे. इसके जवाब में Rajiv Gandhi ने कहा कि ‘मेरे पास ऑप्शन नहीं है… मैं तो वैसे भी मारा जाऊंगा’.
एक तरफ पत्नी के आंसु, दूसरी तरफ कैबिनेट का प्रेशर
दिल्ली पहुंचने के बाद राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह सीधे एम्स अस्पताल गए… वहां से राजीव उनके साथ राष्ट्रपति भवन आए. ज़रा सोचिए क्या गुज़र रहा होगा उस वक्त Rajiv Gandhi के मन पर. किस दर्द और तकलीफ से गुज़रे होंगे वो. एक तरफ मां की दर्दनाक मौत, तो दूसरी तरफ देश को संभालने की जिंम्मेदारी. एक तरफ पत्नी के आंसु तो दूसरी तरफ पूरी कैबिनेट का उन्हे पीएम बनाने के प्रेशर. खैर इसी पशोपेश के बीच वो शाम पौने सात बजे राष्ट्रपति भवन पहुंचे और नई सरकार की शपथ ली. राजीव के साथ प्रणब मुखर्जी, पीवी नरसिम्हा राव और पी. शिवशंकर ने भी मंत्रीपद की शपथ ली. सिख भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बूटा सिंह को भी शपथ दिलाई गई. नवनिर्मित प्रधानमंत्री को शपथ दिलाने से पहले ज्ञानी जैल सिंह ने इंदिरा गांधी की अचानक मौत पर शोक प्रकट किया और दो मिनट का मौन रखा.
दूरदर्शन पर दी गई इंदिरा की मौत की खबर

राजीव गांधी की नई सरकार बनने के बाद राष्ट्रपति भवन से एक प्रेस रिलीज़ जारी की गई… जिसमें आधिकारिक तौर पर Indira Gandhi की मौत की घोषणा की गई. साथ ही दूरदर्शन पर देश को इंदिरा गांधी के निधन की जानकारी के साथ Rajiv Gandhi की नई सरकार बनने की भी जानकारी दी गई. इसके दो दिन बाद 3 नवंबर, 1984 को दिल्ली में इंदिरा गांधी का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज़ के साथ किया गया. इस तरह इंदिरा युग का अंत और राजीव युग की शुरुआत होती है. तो दोस्तों इस तरह से Rajiv Gandhi देश के छठे प्रधानमंत्री बनते हैं.
स्वभाव से सीधे और सरल इंसान थे Rajiv
प्रधानमंत्री बनने वाले राजीव के सामने चुनौतियों का अंबार लगा था. ना तो उन्हे राजनीति का ज्यादा तजुर्बा था और ना ही उनके स्वभाव में चतुराई थी. राजीव सीधे सादे सरल स्वभाव के इंसान थे. जो देश के साथ-साथ अपने परिवार को भी कुछ वक्त देना चाहता था. राजीव के करीब 5 साल के कार्यकाल के दौरान उनके नाम कुछ उपलब्धियां रहीं तो कुछ मामलों में उनकी आलोचना भी हुई…
राजीव गांधी की उपलब्धियां
भारत में राजीव गांधी को कंप्यूटर क्रांति का जनक कहा जाता है. उन्होंने कंप्यूटर को हर घर तक पहुंचाने का सपना देखा था और उसे पूरा करने की कोशिश भी की. राजीव गांधी के वक्त ही National Informatics Centre की स्थापना की गई थी. MTNL और VSNL की शुरुआत भी राजीव के कार्यकाल में ही हुई थी.
राजीव गांधी की हुई आलोचना

कुछ मामले ऐसे भी थे जिनमें राजीव सरकार की खूब किरकिरी हुई थी. इसी तरह का एक मामला था शाहबानों का. जिसे लेकर आज तक Rajiv Gandhi सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाता है. दरअसल शाहबानो एक मुस्लिम महिला थी जिसे 59 साल की उम्र में उसके पति ने तलाक दे दिया था. दोनों के 5 बच्चे थे. शाहबानो ने गुजारा भत्ता के लिए कोर्ट में केस दायर किया. पहले District Court और फिर High Court ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया. जो उसके पति को नामंजूर था. शाहबानो के पति मोहम्मद अहमद खान खुद भी बड़े वकील थे. उन्होंने High Court के फैसले को Supreme Court में चैलेंज किया. खान ने तर्क दिया कि जिस धारा के अंतर्गत गुजारे-भत्ते की मांग की गई है वह मुस्लिमों पर लागू ही नहीं होती क्योंकि ये मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा है. मामला 5 जजों की संविधान पीठ में पहुंचा. 23 अप्रैल 1985 को तत्कालीन Chief Justice YV चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया. इससे मुस्लिम समाज के नेता भड़क गए. वो सरकार पर दबाव बनाने लगे. इससे प्रधानमंत्री राजीव गांधी घबरा गए… उन्हे लगा कि इस तरह तो मुस्लिम वोट कांग्रेस के हाथ से निकल जाएंगे. लिहाज़ा राजीव ने संसद में कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही पलट दिया. इसके बाद राजीव गांधी पर मुस्लिमों के तुष्टिकरण के आरोप लगने शुरू हो गए.
हिंदुओं को खुश करने की कोशिश
अब राजीव गांधी फिर फंसा हुआ महसूस कर रहे थे. उस वक्त तक अयोध्या राम जन्मभूमि आंदोलन जोर पकड़ने लगा था. जिसके चलते Rajiv Gandhi ने हिंदुओं को खुश करने के लिए एक बड़ा दांव खेला. उन्होने 37 साल से बंद पड़े विवादित राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद का गेट खुलवाने के लिए 31 जनवरी 1986 को जिला कोर्ट में याचिका दायर की. इसके अगले ही दिन एक फरवरी को District Judge KM Pandey ने गेट खोलने के आदेश दे दिए. और इस तरह से वहां हिंदुओं ने लंबे समय के बाद पूजा-अर्चना शुरू की.
बोफोर्स घोटाले में उछला नाम

इसी तरह से एक और मामला था जिसके चलते राजीव सरकार की दुनियाभर में बदनामी हुई थी… वो था बोफोर्स कांड. 24 मार्च 1986 को Rajiv Gandhi की सरकार ने Sweeden की हथियार बनाने वाली कंपनी AB Bofors से 1,437 करोड़ रुपए का करार किया था. इस सौदे के तहत Indian Army को 155mm वाली 400 होवित्जर तोप यानि बोफोर्स तोप की सप्लाई की जानी थी… वरिष्ठ पत्रकार देबाशीष मुखर्जी अपनी किताब The Disruptor : How VP Singh Shook India में लिखते हैं कि “इस डील में राजीव सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. जिसके बाद राजीव सरकार में रक्षा मंत्री रहे वीपी सिंह को इस्तीफा देना पड़ा था. इस रक्षा सौदे को लेकर स्वीडन की मीडिया ने दावा किया कि डील के लिए AB BOFORS कंपनी ने भारत सरकार के बड़े नेताओं और रक्षा विभाग के अधिकारी को 60 करोड़ की घूस दी है. इस खबर से भारत में भूचाल ला दिया था. उस डील में गांधी परिवार के नजदीकी इटली के एक बिजनेसमैन ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने बिचौलिये का रोल निभाया था. आरोप है कि उन्होंने ही दलाली की रकम नेताओं तक भिजवाई थी”. इसी हंगामे के बीच 1989 में आम चुनाव हुए और राजीव गांधी को देश की जनता ने रिजेक्ट कर दिया.
सच साबित हुआ सोनिया गांधी का डर
चुनाव के दो साल बाद वही हुआ जिसका Sonia Gandhi को डर था… दरअसल Rajiv Gandhi ने अपने कार्यकाल के दौरान दक्षिणी पड़ोसी देश श्रीलंका में शांति सेना भेजी थी. राजीव के इस कदम से तमिल विद्रोही संगठन लिट्टे बुरी तरह भड़क गया था. और वो इसका बदला लेने के लिए उतावला था. इसी के चलते एक बार श्रीलंका में राजीव गांधी पर बंदूक की बट से जानलेवा हमला किया गया था लेकिन वो बच गए… मगर वो कहते हैं न – होनी को कौन टाल सकता है. जो लिखा है वो होकर रहेगा.
देश ने खोया सुपर विजिनरी नेता

साल आया 1991… जब लोकसभा चुनाव के प्रचार के लिए राजीव चेन्नई के पास श्रीपेरम्बदूर गए तो वहां लिट्टे ने उनपर पर ऐसा खतरनाक आत्मघाती हमला करवाया जिसने दुनिया को हिला कर रख दिया था. ये तस्वीर उनकी मौत से कुछ सेकेंड पहले की है जब राजीव को फूलों का हार पहनाने के बहाने लिट्टे की महिला आतंकी धनु आगे बढ़ी. उसने राजीव के पैर छुए और झुकते हुए कमर पर बंधे विस्फोटकों में ब्लास्ट कर दिया. वो धमाका इतना जबरदस्त था कि आसपास के कई लोगों के चीथड़े उड़ गए. चारों तरफ चीख पुकार मच गई थी. जैसे ही धुआं छंटा तो पूर्व प्रधानमंत्री Rajiv Gandhi की तलाश शुरू की गई. लेकिन वहां उनके शरीर के टुकड़ों के अलावा कुछ न मिला. और इस तरह देश ने एक सुपर विज़िनरी नेता को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया.
