Ayatollah Ali Khamenei की हत्या: क्या अमेरिका के लिए ‘मिशन सफल’ रहा या बढ़ गई हैं मुश्किलें?
मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। Ayatollah Ali Khamenei की हत्या को भले ही अमेरिका अपनी एक बड़ी रणनीतिक उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहा हो, लेकिन हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। जानकारों का मानना है कि 86 वर्षीय सुप्रीम लीडर की मौत ने अमेरिका की टेंशन कम करने के बजाय और ज्यादा बढ़ा दी है। ईरान में जिस तख्तापलट और शांति समझौते की उम्मीद अमेरिका कर रहा था, वो अब कोसों दूर नजर आ रही है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर ईरान की सैन्य ताकत और Ayatollah Ali Khamenei के बाद की बदलती परिस्थितियों ने अमेरिका को कैसे मुश्किल में डाल दिया है।
ईरान की सैन्य शक्ति: मिसाइलों और ड्रोन्स का जखीरा
अमेरिका के लिए ईरान को नजरअंदाज करना नामुमकिन है, क्योंकि ईरान के पास परमाणु हथियार न होने के बावजूद दुनिया का सबसे घातक मिसाइल प्रोग्राम है।
- मिसाइल ताकत: ईरान के पास करीब 3,000 मिसाइलों का भंडार है, जिसमें 1,200 मिसाइलें लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम हैं।
- ड्रोन तकनीक: एशिया लाइव की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास दुनिया का सबसे खतरनाक माना जाने वाला ‘शाहेद ड्रोन‘ है, जिसकी संख्या लगभग 80,000 है।
- सैनिक बल: ग्लोबल फायर पावर के मुताबिक, ईरान की थल सेना में 6 लाख सैनिक हैं। इसके अलावा, कुख्यात इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) में 5 लाख ट्रेंड सैनिक और करीब 1 करोड़ लोगों की ‘बासित फोर्स’ है, जो किसी भी वक्त युद्ध के लिए तैयार रहती है।
अमेरिका की मुसीबत के मुख्य कारण
1. उत्तराधिकारी का ‘4 प्लस फॉर्मूला’
ईरान को इस बात का पहले से आभास था कि उसके सुप्रीम लीडर पर हमला हो सकता है। इसके लिए उन्होंने ‘4 प्लस फॉर्मूला’ तैयार किया था, जिसके तहत Ayatollah Ali Khamenei के चार उत्तराधिकारी पहले ही तय कर दिए गए थे। इन उत्तराधिकारियों में अली लारिजानी जैसे कट्टरपंथी नेताओं का नाम शामिल है।

ईरानी-अमेरिकी विश्लेषक इमान जलाली का कहना है कि अब स्थिति और अधिक अस्पष्ट और खतरनाक हो गई है। नए उत्तराधिकारी 86 साल के खामेनेई से भी कहीं ज्यादा कट्टरपंथी हैं, जिन्हें झुकाना या जिनके साथ समझौता करना अमेरिका के लिए लगभग असंभव होगा।
2. तख्तापलट अब हुआ नामुमकिन
अमेरिका की योजना थी कि खामेनेई के जाने के बाद जनता सड़कों पर उतरेगी और सत्ता परिवर्तन होगा। लेकिन वर्तमान स्थिति इसके विपरीत है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान पर पूरी तरह नियंत्रण पाने के लिए अमेरिका को जमीन पर कम से कम 10 लाख सैनिक उतारने होंगे। अमेरिकी जनता फिलहाल अपने सैनिकों की जान जोखिम में डालने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। एक सर्वे के अनुसार, 50% से ज्यादा अमेरिकी नागरिक 10 से ज्यादा जवानों की मौत को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।
3. ‘सिंपैथी कार्ड’ ने ईरान को किया मजबूत
भले ही ईरान की जनता सरकार की कुछ नीतियों से नाराज थी, लेकिन Ayatollah Ali Khamenei के प्रति उनमें एक अलग तरह का सम्मान था। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ एडम कोचनर के अनुसार, खामेनेई को मारकर अमेरिका ने उन्हें एक ‘धार्मिक शहीद’ का दर्जा दे दिया है। अब ईरान का कट्टरपंथी गुट इस सहानुभूति का उपयोग अपने एजेंडे को और मजबूती से लागू करने के लिए करेगा।
4. सहयोगियों पर मंडराता खतरा
ईरान ने साफ कर दिया है कि वो इस हत्या का बदला जरूर लेगा। ईरान की सुरक्षा सर्वोच्च परिषद के सचिव अली लारिजानी ने चेतावनी दी है कि वे अमेरिका के ‘दिल’ पर हमला करेंगे, जिसका सीधा इशारा सऊदी अरब की तरफ माना जा रहा है। मिडिल ईस्ट में अमेरिका के अन्य सहयोगी जैसे UAE, बहरीन और जॉर्डन भी अब ईरान के रडार पर हैं।
Ayatollah Ali Khamenei की हत्या ने मिडिल ईस्ट के समीकरणों को और अधिक जटिल बना दिया है। अमेरिका जिसे अपनी जीत मान रहा है, वो भविष्य में उसके और उसके सहयोगियों के लिए एक दुःस्वप्न साबित हो सकती है।
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