CM Yogi ने नाम लिए बिना ‘प्रयागराज विवाद’ को दिया नया मोड़ ?
प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच शुरू हुआ विवाद अब केवल धार्मिक या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि ये उत्तर प्रदेश की राजनीति में शीर्ष नेतृत्व के अलग-अलग सुरों का प्रतीक बनता जा रहा है। एक ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (CM Yogi) का सख्त रुख है, तो दूसरी ओर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का संतों के प्रति सम्मान और नरमी से भरा बयान। इन दोनों रुखों ने सियासी गलियारों में नई बहस को जन्म दे दिया है।

‘कालनेमि’ संदर्भ, CM Yogi का कड़ा संदेश
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने हालिया बयान में रामचरितमानस के पात्र ‘कालनेमि’ का उल्लेख किया। पौराणिक कथा के अनुसार, कालनेमि ने साधु का वेश धरकर हनुमान जी को उनके उद्देश्य से भटकाने का प्रयास किया था। योगी आदित्यनाथ माघ मेले को एक पवित्र ‘यज्ञ’ के रूप में देखते हैं और ऐसे में जो भी इस आयोजन में बाधा उत्पन्न करता है, उसे प्रतीकात्मक रूप से कालनेमि की श्रेणी में रखा जा सकता है।

हालांकि इस बयान को कुछ लोग विपक्ष पर हमला मान रहे हैं, लेकिन जिस समय और संदर्भ में बिना किसी का नाम लिए CM Yogi की ओर से ये टिप्पणी आई, उसे सीधे तौर पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के टकराव से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे ये संकेत मिला कि सरकार और प्रशासन इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।
CM Yogi और डिप्टी सीएम केशव के बयान में विरोधाभास क्यों ?
सीएम योगी के विपरीत डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को ‘पूज्य संत’ बताते हुए उनके साथ हुई घटना की जांच कराने की बात कही। उन्होंने सार्वजनिक रूप से उनके चरणों में प्रणाम निवेदित करने की बात भी कही, जिसे सियासी तौर पर बेहद अहम माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये केवल व्यक्तिगत मतभेद नहीं, बल्कि एक तरह की ‘ट्रैक-2 डिप्लोमेसी’ हो सकती है। केशव मौर्य का विश्व हिंदू परिषद से जुड़ा रहा अनुभव और संत समाज में उनकी पकड़, सरकार के लिए एक सेतु का काम कर सकती है। जब प्रशासन सख्ती पर अड़ा हो, तब संतों के असंतोष को शांत करने की जिम्मेदारी मौर्य जैसे नेता निभा सकते हैं।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने केशव मौर्य को समझदार व्यक्ति बताते हुए कहा कि डिप्टी सीएम मानते हैं कि अधिकारियों से गलती हुई है। उन्होंने यहां तक कहा कि बीजेपी को ऐसे ही समझदार व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना चाहिए था, तो प्रदेश के लिए बेहतर होता। इस बयान से साफ है कि मामला अब धार्मिक मर्यादा से निकलकर राजनीतिक तुलना और संदेश तक पहुंच चुका है।

शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती का शंकराचार्य की स्वतंत्रता पर जोर
पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने भी पूरे मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि शंकराचार्य की इच्छा पर कोई अंकुश नहीं लगा सकता। उनके अनुसार, ये तय करना शंकराचार्य का अधिकार है कि वे कैसे और किस माध्यम से जाएं या स्नान करें। इस बयान ने संत समाज के भीतर शंकराचार्य की स्वायत्तता के सवाल को और मजबूत किया है।
‘डबल इंजन’ सरकार पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्ष और राजनीतिक हलकों में ये सवाल उठने लगा है कि क्या यूपी सरकार के ‘दो इंजन’ अब अलग-अलग दिशा में चल रहे हैं। एक ओर प्रशासन की सख्ती और मुख्यमंत्री का कठोर संदेश, दूसरी ओर डिप्टी सीएम की सहानुभूति—क्या ये अंतर्विरोध किसी बड़े टकराव का संकेत है या सोची-समझी रणनीति?
विवाद जारी, राजनीति गरम
फिलहाल मेला प्रशासन और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बीच विवाद थमता नहीं दिख रहा है। शंकराचार्य ने स्पष्ट किया है कि जब तक उन्हें ससम्मान गंगा स्नान नहीं कराया जाता और भविष्य के लिए स्पष्ट घोषणा नहीं होती, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा। स्वास्थ्य को लेकर उन्होंने कहा कि अब वे ठीक हैं और अपना संकल्प नहीं छोड़ेंगे।
ये पूरा घटनाक्रम उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म, सत्ता और रणनीति के जटिल रिश्तों को उजागर करता है। आने वाला समय बताएगा कि ये मतभेद अस्थायी है या किसी बड़े राजनीतिक संदेश की भूमिका।
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