Anjel Chakma की मौत ने खोखले समाज और पूरे सिस्टम को किया बेनकाब !
देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा (Anjel Chakma) की हत्या की ख़बर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। ये घटना सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि उस जहरीली सोच का परिणाम है जो वर्षों से समाज के भीतर पनपती रही है। अस्पताल में 17 दिनों तक जिंदगी और मौत से संघर्ष करने के बाद एंजेल की मौत ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां पहचान और शक्ल के आधार पर इंसान की जान की कीमत तय की जाती है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया: नफरत के खिलाफ आवाज
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इस घटना को समाज में फैल रही घृणा का नतीजा बताया। उनका कहना है कि हिंसा अचानक पैदा नहीं होती, बल्कि गलत सूचनाओं और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के भड़काऊ बयानों से ये सोच धीरे-धीरे मजबूत होती है। उन्होंने देश की विविधता, प्रेम और एकता की परंपरा को याद दिलाते हुए पूर्वोत्तर के लोगों के साथ एकजुटता जताई।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस हत्या पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विघटनकारी मानसिकता रोज किसी न किसी की जान ले रही है और ऐसे तत्वों से देश की एकता को खतरा है। अखिलेश यादव ने शांति प्रिय नागरिकों से एकजुट होकर नफरत फैलाने वालों की पहचान और बहिष्कार करने की अपील की, साथ ही सर्वोच्च न्यायालय से स्वतः संज्ञान लेकर न्याय सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
देहरादून में Angel Chakma के साथ क्या हुआ था ?
9 दिसंबर को देहरादून में एंजेल चकमा और उनके छोटे भाई माइकल पर छह युवकों ने हमला किया। कथित तौर पर नस्लीय टिप्पणियों का विरोध करने पर एंजेल पर चाकू से वार किया गया। गंभीर रूप से घायल एंजेल 17 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे और 26 दिसंबर को उन्होंने दम तोड़ दिया। इस मामले में पुलिस ने हत्या के प्रयास और आपराधिक साजिश सहित कई धाराओं में केस दर्ज किया है। पांच आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, जबकि मुख्य आरोपी फरार बताया जा रहा है।
Anjel Chakma के परिवार के आरोप और पीड़ा
एंजेल के पिता तरुण प्रसाद चकमा ने पुलिस पर शुरुआत में मामले को हल्का बताने और एफआईआर में देरी का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि हमले के बाद जब उन्होंने अपने बेटे को अस्पताल में देखा, तो उसकी हालत बेहद गंभीर थी। परिवार का कहना है कि पूर्वोत्तर से आने वाले छात्रों और कामकाजी युवाओं के साथ देश के अन्य हिस्सों में भेदभावपूर्ण व्यवहार बंद होना चाहिए, क्योंकि वे भी उतने ही भारतीय हैं।
समस्या सिर्फ एक राज्य की नहीं
एंजेल चकमा की मौत ने एक व्यापक सामाजिक सच्चाई को उजागर किया है। पूर्वोत्तर के लोग ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से महानगरों में आने वाले लोग भी अक्सर अपमानजनक संबोधनों और भेदभाव का सामना करते हैं। ये मानसिकता वही पीड़ा देती है, जो विदेशों में नस्लीय टिप्पणियों से भारतीयों को होती है।
ये घटना चेतावनी है कि अगर नफरत और भेदभाव के खिलाफ समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इसकी कीमत समाज को बार-बार चुकानी पड़ेगी। न्याय, समानता और सम्मान केवल शब्द नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरने चाहिए। एंजेल चकमा की मौत देश से ये सवाल पूछती है कि क्या हम सच में एक-दूसरे को अपना मानने के लिए तैयार हैं।
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